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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

सूरज हर सेकंड इतनी ऊर्जा कैसे पैदा करता है?

सूरज हर सेकंड इतनी ऊर्जा पैदा करता है कि वह पूरी पृथ्वी को अरबों वर्षों तक रोशन और गर्म रख सकता है। यह बात सुनने में आश्चर्यजनक लगती है, लेकिन इसके पीछे अत्यंत सटीक और शक्तिशाली वैज्ञानिक प्रक्रिया काम कर रही होती है।

सूरज के केंद्र में तापमान लगभग डेढ़ करोड़ डिग्री सेल्सियस होता है और दबाव इतना अधिक होता है कि सामान्य परिस्थितियों में असंभव लगने वाली प्रतिक्रियाएँ संभव हो जाती हैं।

इन्हीं चरम परिस्थितियों में हाइड्रोजन के परमाणु आपस में मिलते हैं। यह प्रक्रिया नाभिकीय संलयन कहलाती है, जिसमें अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है।

इस संलयन प्रक्रिया के दौरान हाइड्रोजन धीरे-धीरे हीलियम में बदलता है और द्रव्यमान का एक छोटा हिस्सा ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है, जिसे आइंस्टीन के प्रसिद्ध सूत्र E=mc² से समझा जाता है।

यही निरंतर चलने वाली प्रक्रिया सूरज को हर सेकंड असीम ऊर्जा देने का स्रोत बनाती है और हमारे सौरमंडल को जीवन के अनुकूल बनाए रखती है।


नाभिकीय संलयन को सरल भाषा में समझें तो यह वैसा है जैसे बहुत हल्के कण आपस में मिलकर थोड़ा भारी कण बना लें और बची हुई ऊर्जा बाहर निकल जाए। सूरज के भीतर यही प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।

सूरज के केंद्र में चार हाइड्रोजन नाभिक मिलकर एक हीलियम नाभिक बनाते हैं। इस प्रक्रिया में जो थोड़ा सा द्रव्यमान कम हो जाता है, वही ऊर्जा के रूप में बाहर निकलता है।

यह ऊर्जा पहले सूरज के भीतर धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और फिर उसकी सतह से प्रकाश और ऊष्मा के रूप में अंतरिक्ष में फैल जाती है। इसी कारण हमें सूरज से लगातार रोशनी और गर्मी मिलती रहती है।

यह प्रक्रिया अत्यंत स्थिर और नियंत्रित होती है। यदि यह थोड़ी भी असंतुलित हो जाए, तो सूरज का अस्तित्व ही संभव नहीं होगा। यही संतुलन उसे अरबों वर्षों तक ऊर्जा देने योग्य बनाता है।

इस तरह सूरज हर सेकंड ऊर्जा पैदा करता रहता है, बिना रुके, बिना थके, और यही ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन की आधारशिला बनती है।


सूरज से निकलने वाली ऊर्जा केवल प्रकाश और गर्मी तक सीमित नहीं है, बल्कि वही पृथ्वी पर लगभग हर प्राकृतिक प्रक्रिया को संचालित करती है। मौसम, जलचक्र, पवन प्रवाह और पौधों में प्रकाश संश्लेषण—सबका आधार यही ऊर्जा है।

पौधे सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके भोजन बनाते हैं और उसी प्रक्रिया से पृथ्वी पर जीवन की पूरी खाद्य श्रृंखला शुरू होती है। इस प्रकार सूरज की ऊर्जा अप्रत्यक्ष रूप से हर जीव तक पहुँचती है।

वैज्ञानिक आज इसी प्रक्रिया से प्रेरित होकर पृथ्वी पर स्वच्छ ऊर्जा स्रोत विकसित कर रहे हैं। सौर ऊर्जा तकनीक उसी सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें बिना प्रदूषण के ऊर्जा प्राप्त की जाती है।

भविष्य में मानव द्वारा नियंत्रित नाभिकीय संलयन को ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग करने का प्रयास भी इसी कारण किया जा रहा है, क्योंकि यह सुरक्षित, दीर्घकालिक और अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा प्रदान कर सकता है।

इस प्रकार सूरज हर सेकंड जो अपार ऊर्जा पैदा करता है, वह न केवल हमारे वर्तमान जीवन को बनाए रखती है, बल्कि भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए भी प्रेरणा देती है।


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