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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

इंद्रधनुष गोल आकार का क्यों होता है, आधा क्यों दिखता है?

इंद्रधनुष: प्रकाश का वैज्ञानिक चमत्कार

इंद्रधनुष कोई ठोस वस्तु नहीं है।

यह सूर्य के प्रकाश और वर्षा की बूंदों के बीच होने वाली भौतिक प्रक्रिया का परिणाम है।

जब सूर्य का सफेद प्रकाश वर्षा की बूंद में प्रवेश करता है, तो वह अपवर्तन के कारण मुड़ जाता है।

इसी प्रक्रिया को अपवर्तन कहा जाता है।

रंग अलग क्यों दिखाई देते हैं?

सफेद प्रकाश वास्तव में कई रंगों का मिश्रण होता है।

जब प्रकाश पानी की बूंद में प्रवेश करता है, तो प्रत्येक रंग अलग-अलग कोण पर मुड़ता है।

बैंगनी प्रकाश अधिक मुड़ता है, जबकि लाल प्रकाश कम।

इस प्रक्रिया को विवर्तन या डिस्पर्शन कहा जाता है।

आंतरिक परावर्तन की भूमिका

प्रकाश बूंद के भीतर पहुँचने के बाद उसकी आंतरिक सतह से परावर्तित होता है।

इसके बाद वह पुनः बाहर निकलते समय फिर से अपवर्तित होता है।

यही दोहरी प्रक्रिया इंद्रधनुष के निर्माण का कारण बनती है।

४२ डिग्री का विशेष कोण

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार लाल रंग लगभग ४२ डिग्री के कोण पर प्रकट होता है।

बैंगनी रंग लगभग ४० डिग्री पर।

यही निश्चित कोण इंद्रधनुष को वृत्ताकार संरचना प्रदान करता है।

हर बूंद से निकलने वाला प्रकाश एक निश्चित कोण पर ही हमारी आँख तक पहुँचता है।

इसलिए इंद्रधनुष एक ज्यामितीय संरचना के रूप में दिखाई देता है।


इंद्रधनुष की ज्यामिति: वृत्त का विज्ञान

इंद्रधनुष वास्तव में एक पूर्ण वृत्त होता है।

यह केवल आधा चाप नहीं है जैसा हमें जमीन से दिखाई देता है।

भौतिकी के अनुसार यह सूर्य, वर्षा की बूंदों और पर्यवेक्षक की स्थिति पर निर्भर करता है।

दर्शक का दृष्टिकोण क्यों महत्वपूर्ण है?

इंद्रधनुष का केंद्र हमेशा उस बिंदु के ठीक विपरीत होता है जहाँ सूर्य स्थित है।

इस बिंदु को “एंटी-सोलर पॉइंट” कहा जाता है।

सूर्य आपकी पीठ के पीछे होता है और वर्षा की बूंदें सामने।

४२ डिग्री के कोण पर आने वाली रोशनी ही आपकी आँख तक पहुँचती है।

शंकु संरचना कैसे बनती है?

जब अनगिनत बूंदें समान कोण पर प्रकाश परावर्तित करती हैं, तो वे एक काल्पनिक शंकु बनाती हैं।

इस शंकु का शीर्ष आपकी आँख पर होता है।

शंकु का आधार वृत्ताकार होता है।

यही कारण है कि इंद्रधनुष की वास्तविक आकृति एक पूर्ण वृत्त है।

जमीन से आधा ही क्यों दिखता है?

पृथ्वी की सतह इस वृत्त के निचले हिस्से को छिपा देती है।

हम जमीन पर खड़े होते हैं, इसलिए नीचे का भाग दिखाई नहीं देता।

इसी कारण हमें केवल आधा चाप दिखाई देता है।

यदि आप हवाई जहाज या ऊँचे पर्वत से देखें, तो पूरा वृत्त दिखाई दे सकता है।

वैज्ञानिक और पायलट अक्सर पूर्ण गोल इंद्रधनुष देखने की पुष्टि करते हैं।

हर व्यक्ति का इंद्रधनुष अलग होता है

रोचक तथ्य यह है कि दो लोग बिल्कुल एक ही इंद्रधनुष नहीं देखते।

प्रत्येक व्यक्ति की आँख और स्थिति अलग होती है।

इसलिए हर पर्यवेक्षक का इंद्रधनुष उसकी अपनी दृष्टि-रेखा पर आधारित होता है।

इंद्रधनुष वास्तव में एक व्यक्तिगत प्रकाशीय अनुभव है।


डबल इंद्रधनुष कैसे बनता है?

कभी-कभी आकाश में दो इंद्रधनुष दिखाई देते हैं।

ऊपरी वाला हल्का और धुंधला होता है।

यह तब बनता है जब प्रकाश पानी की बूंद के अंदर दो बार परावर्तित होता है।

प्राथमिक इंद्रधनुष में एक बार आंतरिक परावर्तन होता है।

द्वितीयक इंद्रधनुष में दो बार।

रंग उल्टे क्यों दिखाई देते हैं?

प्राथमिक इंद्रधनुष में लाल रंग ऊपर और बैंगनी नीचे होता है।

लेकिन द्वितीयक इंद्रधनुष में यह क्रम उल्टा हो जाता है।

दूसरे परावर्तन के कारण प्रकाश का पथ बदल जाता है।

भौतिकी के अनुसार द्वितीयक इंद्रधनुष लगभग ५० से ५३ डिग्री के कोण पर बनता है।

इसी कारण इसका रंग क्रम उलट जाता है।

बीच का अंधेरा क्षेत्र क्यों दिखता है?

दोनों इंद्रधनुषों के बीच का क्षेत्र अपेक्षाकृत गहरा दिखाई देता है।

इसे अलेक्जेंडर बैंड कहा जाता है।

१७वीं शताब्दी में वैज्ञानिक अलेक्जेंडर ऑफ अफ्रोडिसियस ने इसका वर्णन किया था।

यह क्षेत्र इसलिए गहरा दिखता है क्योंकि उस कोण पर प्रकाश कम पहुँचता है।

क्या इंद्रधनुष को छुआ जा सकता है?

इंद्रधनुष कोई ठोस वस्तु नहीं है।

यह केवल प्रकाश और बूंदों की ज्यामितीय व्यवस्था है।

आप जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे, इंद्रधनुष भी स्थान बदलता प्रतीत होगा।

इसीलिए इसे पकड़ना संभव नहीं है।

अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष

इंद्रधनुष एक पूर्ण वृत्ताकार प्रकाशीय संरचना है।

हम इसे आधा इसलिए देखते हैं क्योंकि पृथ्वी का क्षितिज उसके निचले भाग को छिपा देता है।

४२ डिग्री और ५० डिग्री जैसे निश्चित कोण इसकी ज्यामिति को नियंत्रित करते हैं।

डबल इंद्रधनुष और उल्टे रंग प्रकाश के दोहरे परावर्तन का परिणाम हैं।

इंद्रधनुष हमें यह सिखाता है कि प्रकृति में सुंदरता और गणित साथ-साथ चलते हैं।


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