
जब “नामुमकिन” विज्ञान का पसंदीदा शब्द था
आज हम जिस विज्ञान को अंतिम सत्य मानते हैं, वह कभी खुद कई सच्चाइयों को नामुमकिन कह चुका है। इतिहास गवाह है कि विज्ञान ने अनेक बार ऐसी सीमाएँ खींचीं, जिन्हें समय ने बेरहमी से मिटा दिया।
कभी कहा गया कि इंसान उड़ नहीं सकता। कभी कहा गया कि पृथ्वी स्थिर है। कभी यह माना गया कि परमाणु अविभाज्य है।
लेकिन हर बार, जब किसी ने “यह नहीं हो सकता” कहा, उसी क्षण किसी और ने यह साबित करने की तैयारी शुरू कर दी कि यह हो सकता है।
विज्ञान में “नामुमकिन” का असली अर्थ क्या होता है?
विज्ञान में “नामुमकिन” का अर्थ यह नहीं होता कि कोई चीज़ कभी नहीं हो सकती। इसका मतलब केवल इतना होता है कि वर्तमान ज्ञान और तकनीक उस चीज़ को समझने या सिद्ध करने में सक्षम नहीं है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब अस्थायी सीमाओं को अंतिम सत्य मान लिया जाता है। इतिहास में कई महान वैज्ञानिकों ने भी यही गलती की।
उदाहरण के लिए, 19वीं सदी में कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों का मानना था कि:
- भारी वस्तुएँ हवा में नहीं उड़ सकतीं
- समय हर जगह समान चलता है
- प्रकाश की गति बदली नहीं जा सकती
आज यही बातें विज्ञान की सबसे बड़ी क्रांतियों की नींव बन चुकी हैं।
समस्या विज्ञान नहीं, सोच होती है
विज्ञान की असली कमजोरी उसके सिद्धांत नहीं, बल्कि मानव सोच रही है। जब कोई विचार प्रचलित हो जाता है, तो उसे चुनौती देना कठिन हो जाता है—खासकर तब, जब वह विचार किसी प्रसिद्ध वैज्ञानिक द्वारा दिया गया हो।
इतिहास बताता है कि नई खोजों का सबसे बड़ा विरोध अक्सर वैज्ञानिक समुदाय से ही आया है। नई सोच को “अवैज्ञानिक”, “असंभव” या “काल्पनिक” कहकर खारिज कर दिया गया।
लेकिन जैसे-जैसे उपकरण बदले, गणनाएँ सुधरीं और अवलोकन बढ़ा—वैसे-वैसे असंभव की दीवारें गिरती चली गईं।
नामुमकिन से सच तक की यात्रा
विज्ञान का इतिहास असल में गलत सिद्धांतों से सही खोजों तक की यात्रा है। हर पीढ़ी ने पिछली पीढ़ी की सीमाओं को तोड़ा है।
यही कारण है कि आज जो बातें हमें सामान्य लगती हैं, वे कभी मानव कल्पना से परे थीं।

जब इंसान के उड़ने को विज्ञान ने खारिज कर दिया
उन्नीसवीं सदी के अंत तक अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना था कि इंसान का उड़ना भौतिकी के नियमों के खिलाफ है। कहा गया कि मानव द्वारा संचालित मशीन हवा से भारी होने के कारण उड़ ही नहीं सकती।
1895 में एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने यहाँ तक कहा था कि “हवा से भारी वस्तु का उड़ना असंभव है।” लेकिन कुछ ही वर्षों बाद, राइट ब्रदर्स ने वह कर दिखाया जिसे विज्ञान असंभव कह रहा था।
1903 में उनकी पहली नियंत्रित उड़ान ने यह स्पष्ट कर दिया कि समस्या नियमों में नहीं, बल्कि उन्हें समझने के तरीके में थी।
परमाणु को अविभाज्य मानने की भूल
लंबे समय तक परमाणु को पदार्थ की सबसे छोटी और अविभाज्य इकाई माना जाता रहा। “एटम” शब्द ही यूनानी भाषा में अविभाज्य के अर्थ से आया है।
लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में जब इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की खोज हुई, तब यह सिद्ध हो गया कि परमाणु खुद कई हिस्सों से बना है।
इसके बाद न्यूक्लियर फिशन और फ्यूज़न जैसी खोजों ने न केवल इस धारणा को तोड़ा, बल्कि पूरी मानव सभ्यता की दिशा बदल दी।
समय हर जगह एक-सा नहीं चलता — यह कैसे सच हुआ?
कभी यह मान्यता थी कि समय पूरे ब्रह्मांड में समान गति से चलता है। यह धारणा इतनी मजबूत थी कि किसी ने इस पर सवाल उठाने की हिम्मत नहीं की।
फिर आए अल्बर्ट आइंस्टीन, जिन्होंने सापेक्षता के सिद्धांत के माध्यम से यह बताया कि समय गति और गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित होता है।
आज GPS जैसी तकनीकें इस सिद्धांत की पुष्टि करती हैं। यदि समय हर जगह समान चलता, तो GPS कुछ ही घंटों में गलत हो जाता।
पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है — एक असहज सत्य
कभी यह कहना कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, वैज्ञानिक अपराध जैसा माना जाता था। यह विचार धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ था।
कोपरनिकस और गैलीलियो के विचारों को पहले खारिज किया गया, फिर दंडित किया गया। लेकिन समय ने साबित किया कि ब्रह्मांड हमारी धारणाओं से कहीं बड़ा है।
आज यह तथ्य इतना सामान्य है कि हम भूल जाते हैं कि कभी इसे “नामुमकिन” कहा गया था।
इन सभी उदाहरणों से क्या सीख मिलती है?
हर उदाहरण यही दिखाता है कि विज्ञान स्थिर नहीं है। वह स्वयं को सुधारता है, बदलता है और आगे बढ़ता है।
जो बात आज असंभव लगती है, वह कल की पाठ्य-पुस्तक बन सकती है। फर्क केवल इतना है कि कौन सवाल पूछने का साहस करता है।

आज की कौन-सी “नामुमकिन” बातें कल सच बन सकती हैं?
अगर हम इतिहास से कुछ सीखते हैं, तो वह यह कि विज्ञान का सबसे खतरनाक शब्द “नामुमकिन” होता है। आज भी कई ऐसी बातें हैं, जिन्हें विज्ञान पूरी तरह संभव नहीं मानता—लेकिन इतिहास बताता है कि यही बातें भविष्य की सबसे बड़ी सच्चाइयाँ बन सकती हैं।
उदाहरण के लिए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता को एक समय केवल विज्ञान-कथा माना जाता था। आज वही AI डॉक्टरों की मदद कर रही है, कारें चला रही है और वैज्ञानिक शोध को नई दिशा दे रही है।
इसी तरह, मानव जीवन को बहुत लंबा करना या उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करना आज भी विवादास्पद विषय है। लेकिन जीन थेरेपी, स्टेम-सेल रिसर्च और बायोटेक्नोलॉजी इस दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं।
क्या विज्ञान की कोई अंतिम सीमा होती है?
यह सवाल सदियों से पूछा जाता रहा है। हर युग में यह माना गया कि अब विज्ञान अपनी सीमा पर पहुँच गया है—और हर युग ने इस धारणा को गलत साबित किया है।
वास्तविकता यह है कि विज्ञान की सीमाएँ स्थायी नहीं होतीं। जैसे-जैसे हमारे उपकरण बेहतर होते हैं, वैसे-वैसे हमारी समझ भी बढ़ती जाती है।
जो चीज़ आज प्रयोगशाला से बाहर नहीं निकल पाती, वह कल हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन सकती है।
विज्ञान को आगे बढ़ाने वाला सबसे बड़ा तत्व क्या है?
विज्ञान को आगे बढ़ाने वाली सबसे बड़ी शक्ति तकनीक नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की हिम्मत है। हर बड़ी खोज की शुरुआत एक साधारण सवाल से हुई है—“अगर ऐसा हो सके तो?”
जब तक सवाल पूछे जाते रहेंगे, तब तक “नामुमकिन” शब्द विज्ञान में टिक नहीं पाएगा।
निष्कर्ष: नामुमकिन सिर्फ एक अस्थायी स्थिति है
विज्ञान का इतिहास हमें यही सिखाता है कि “नामुमकिन” कोई अंतिम फैसला नहीं, बल्कि एक अस्थायी स्थिति है। यह उस बिंदु को दर्शाता है जहाँ हमारी समझ फिलहाल रुक गई है।
जैसे-जैसे मानव जिज्ञासा, तकनीक और ज्ञान आगे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे नामुमकिन की सीमाएँ पीछे हटती जाती हैं।
आज जो बातें हमें अविश्वसनीय लगती हैं, वही आने वाली पीढ़ियों के लिए सामान्य ज्ञान बन सकती हैं।
