
माउंट एवरेस्ट दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत माना जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसकी ऊँचाई वास्तव में मापी कैसे जाती है। इतनी ऊँचाई को नापना सामान्य माप-यंत्रों से संभव नहीं होता।
एवरेस्ट की ऊँचाई मापने के लिए वैज्ञानिक विशेष गणितीय और भूवैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करते हैं। इसमें समुद्र तल को आधार मानकर पर्वत की चोटी तक की ऊँचाई निकाली जाती है।
इतिहास में सबसे पहले ब्रिटिश सर्वेक्षणकर्ताओं ने 19वीं शताब्दी में त्रिकोणमिति विधि से इसकी ऊँचाई मापने का प्रयास किया था। उस समय आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं थी, फिर भी गणनाएँ आश्चर्यजनक रूप से सटीक थीं।
आज के समय में एवरेस्ट की ऊँचाई मापना केवल पर्वतारोहियों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सैटेलाइट और GPS जैसी अत्याधुनिक तकनीकों की मदद से किया जाता है।
यही वैज्ञानिक प्रक्रिया हमें यह विश्वास दिलाती है कि एवरेस्ट की घोषित ऊँचाई केवल अनुमान नहीं, बल्कि सटीक गणनाओं का परिणाम है।

एवरेस्ट की ऊँचाई मापने की पारंपरिक विधि को त्रिकोणमिति कहा जाता है। इसमें पर्वत से कुछ दूरी पर स्थित एक बिंदु से चोटी तक का कोण मापा जाता है।
जब वैज्ञानिक पर्वत की चोटी तक देखने का कोण और आधार दूरी जानते हैं, तो गणितीय सूत्रों की मदद से ऊँचाई की गणना की जाती है। इस प्रक्रिया में समुद्र तल को आधार रेखा माना जाता है।
उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश सर्वेक्षणकर्ताओं ने इसी विधि का उपयोग करके पहली बार एवरेस्ट की ऊँचाई का अनुमान लगाया था, जो आज के आधुनिक माप से काफी करीब था।
आधुनिक समय में त्रिकोणमिति के साथ-साथ GPS तकनीक का भी उपयोग किया जाता है। पर्वत की चोटी पर GPS उपकरण लगाकर पृथ्वी के केंद्र से सटीक दूरी मापी जाती है।
इन सभी मापों को जोड़कर वैज्ञानिक यह तय करते हैं कि एवरेस्ट की ऊँचाई कितनी है और समय के साथ उसमें कोई बदलाव हुआ है या नहीं।

आधुनिक युग में एवरेस्ट की ऊँचाई मापने के लिए सैटेलाइट और GPS तकनीक का उपयोग किया जाता है। पर्वत की चोटी पर GPS रिसीवर स्थापित किया जाता है, जो पृथ्वी के केंद्र से अपनी सटीक स्थिति की गणना करता है।
इसके साथ ही समुद्र तल की सटीक परिभाषा तय करना भी आवश्यक होता है। वैज्ञानिक जियोइड मॉडल का उपयोग करते हैं, जो यह बताता है कि पृथ्वी का औसत समुद्र तल वास्तव में कहाँ स्थित है।
एवरेस्ट की ऊँचाई स्थिर नहीं रहती, क्योंकि हिमालय क्षेत्र टेक्टॉनिक प्लेटों के टकराव से लगातार ऊपर उठ रहा है। भूकंप और भूगर्भीय हलचल भी इसकी ऊँचाई में हल्का परिवर्तन ला सकती है।
इसी कारण नेपाल और चीन समय-समय पर संयुक्त सर्वेक्षण करते हैं। वर्ष 2020 में दोनों देशों ने एवरेस्ट की आधिकारिक ऊँचाई 8,848.86 मीटर घोषित की, जिसमें बर्फ की मोटाई को भी शामिल किया गया।
इस प्रकार एवरेस्ट की ऊँचाई किसी एक अनुमान का परिणाम नहीं, बल्कि गणित, भूविज्ञान, सैटेलाइट विज्ञान और निरंतर निगरानी का संयुक्त निष्कर्ष है।

