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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

एक अभिनेत्री जिसने आधुनिक वायरलेस तकनीक की नींव रखी

क्या सुंदरता और विज्ञान साथ चल सकते हैं?

1940 के दशक में हॉलीवुड की एक अभिनेत्री अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर थीं।

लेकिन दुनिया यह नहीं जानती थी कि वह एक आविष्कारक भी थीं।

उनका नाम था — हेडी लैमर

हेडी लैमर ऑस्ट्रिया में जन्मी हॉलीवुड स्टार थीं।

फिल्मी दुनिया उन्हें ग्लैमर आइकन मानती थी।

लेकिन वैज्ञानिक समुदाय उन्हें आज वायरलेस तकनीक की अग्रदूत मानता है।

समस्या क्या थी?

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रेडियो-नियंत्रित टॉरपीडो आसानी से जाम किए जा सकते थे।

दुश्मन रेडियो सिग्नल पकड़कर उन्हें बाधित कर देता था।

यह सैन्य दृष्टि से बड़ी कमजोरी थी।

यहीं से शुरू हुई एक असाधारण सोच।


सिग्नल को “गायब” करने का विचार

हेडी लैमर और संगीतकार जॉर्ज एंथाइल ने एक अनोखा समाधान सोचा।

अगर रेडियो सिग्नल लगातार एक ही फ्रीक्वेंसी पर रहे तो उसे जाम किया जा सकता है।

लेकिन अगर सिग्नल लगातार फ्रीक्वेंसी बदलता रहे तो उसे पकड़ना मुश्किल हो जाएगा।

यही था Frequency Hopping

इस तकनीक में प्रेषक और रिसीवर साथ-साथ फ्रीक्वेंसी बदलते हैं।

बाहरी व्यक्ति सिग्नल को ट्रैक नहीं कर पाता।

इसे बाद में “Frequency Hopping Spread Spectrum” कहा गया।

वैज्ञानिक आधार

वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार स्प्रेड स्पेक्ट्रम तकनीक सिग्नल को व्यापक बैंडविड्थ में फैलाती है।

इससे हस्तक्षेप कम होता है और सुरक्षा बढ़ती है।

आधुनिक वायरलेस प्रोटोकॉल जैसे Bluetooth इसी सिद्धांत पर काम करते हैं।

तब इसे क्यों नज़रअंदाज़ किया गया?

1942 में पेटेंट दर्ज हुआ लेकिन नौसेना ने इसे तुरंत नहीं अपनाया।

तकनीक अपने समय से आगे थी।

कई वर्षों बाद इसी विचार ने डिजिटल युग की नींव रखी।


आज हर जेब में वही तकनीक है

Wi-Fi, Bluetooth और GPS सभी किसी न किसी रूप में स्प्रेड स्पेक्ट्रम तकनीक पर आधारित हैं।

जलवायु अध्ययनों की तरह संचार विज्ञान में भी फ्रीक्वेंसी प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

आज अरबों डिवाइस सुरक्षित और स्थिर संचार करते हैं उसी सिद्धांत की वजह से।

मान्यता बहुत देर से मिली

1942 का पेटेंट दशकों तक लगभग भुला दिया गया।

लेकिन 1997 में हेडी लैमर को Electronic Frontier Foundation Award मिला।

तब दुनिया ने स्वीकार किया कि एक अभिनेत्री ने तकनीकी क्रांति की नींव रखी थी।

विज्ञान ने क्या सीखा?

वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार नवाचार अक्सर अप्रत्याशित स्रोतों से आता है।

कभी-कभी समाज किसी व्यक्ति को एक ही पहचान में बाँध देता है।

लेकिन प्रतिभा सीमाओं से बड़ी होती है।

अंतिम निष्कर्ष

यह कहानी केवल तकनीक की नहीं है।

यह कहानी है रचनात्मकता, साहस और समय से आगे सोचने की।

एक अभिनेत्री जिसे दुनिया ने सुंदरता से पहचाना विज्ञान ने उसे दूरदर्शिता से पहचाना।

और आज हम सब उनकी सोच का लाभ उठा रहे हैं।


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