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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

पहला विश्व मानचित्र किसने बनाया और वह कितना सही था?

क्या टॉलेमी से पहले भी मानचित्र थे?

हाँ।

सबसे प्राचीन ज्ञात विश्व मानचित्र लगभग ६०० ईसा पूर्व बेबीलोन में बनाया गया था।

यह मिट्टी की पट्टिका पर उकेरा गया था।

इसमें पृथ्वी को एक गोल चक्र के रूप में दर्शाया गया था।

लेकिन यह सीमित और प्रतीकात्मक था।

प्राचीन यूनानी योगदान

छठी और पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानी विद्वानों ने पृथ्वी को गोल माना।

एरैटोस्थनीज (लगभग 240 ईसा पूर्व) ने पृथ्वी की परिधि का अनुमान लगाया।

उसका अनुमान आश्चर्यजनक रूप से वास्तविक मान के काफी निकट था।

यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शुरुआत थी।

टॉलेमी का विश्व मानचित्र (लगभग 150 ईस्वी)

दूसरी शताब्दी ईस्वी में क्लॉडियस टॉलेमी ने ‘जियोग्राफिया’ नामक ग्रंथ लिखा।

इसमें उसने लगभग ८,००० स्थानों के निर्देशांक दर्ज किए।

उसने अक्षांश और देशांतर प्रणाली का उपयोग किया।

यह व्यवस्थित और गणितीय दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम था।

क्या यह पूर्ण विश्व मानचित्र था?

नहीं।

उस समय अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत महासागर अज्ञात थे।

मानचित्र यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और एशिया तक सीमित था।

फिर भी यह अपने समय के लिए अत्यंत उन्नत था।


अक्षांश माप में सटीकता

टॉलेमी अक्षांश मापने में अपेक्षाकृत सटीक था।

अक्षांश सूर्य की ऊँचाई और खगोलीय अवलोकन से निर्धारित किया जा सकता था।

उसने भूमध्य रेखा और भूमध्य सागर क्षेत्रों की स्थिति काफी सही दर्शाई।

यह उस समय की वैज्ञानिक प्रगति को दर्शाता है।

देशांतर की बड़ी समस्या

देशांतर मापना प्राचीन काल में अत्यंत कठिन था।

समय मापने की सटीक तकनीक उपलब्ध नहीं थी।

इस कारण टॉलेमी ने एशिया की चौड़ाई वास्तविकता से अधिक दिखा दी।

उसने पृथ्वी की परिधि को भी कम आँका।

इतिहासकारों के अनुसार उसकी पृथ्वी की परिधि वास्तविक से लगभग २५ प्रतिशत कम थी।

हिंद महासागर को बंद सागर मानना

टॉलेमी के मानचित्र में हिंद महासागर एक बंद जलाशय के रूप में दिखाया गया था।

वह नहीं जानता था कि यह दक्षिण में खुले महासागर से जुड़ा है।

यह उसकी भौगोलिक सीमाओं का उदाहरण है।

फिर भी उसने ज्ञात विश्व को व्यवस्थित ढाँचे में प्रस्तुत किया।

कोलंबस पर प्रभाव

१५वीं शताब्दी में टॉलेमी की रचनाएँ पुनः खोजी गईं।

उसके छोटे पृथ्वी आकार अनुमान ने क्रिस्टोफर कोलंबस को पश्चिम की ओर समुद्री मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया।

१४९२ में कोलंबस ने अमेरिका पहुँचकर एशिया समझ लिया।

यह टॉलेमी की गणनाओं के अप्रत्यक्ष प्रभाव का परिणाम था।

क्या वह अपने समय के लिए सटीक था?

हाँ, अपने युग की सीमाओं को देखते हुए उसका मानचित्र अत्यंत उन्नत था।

उसने गणितीय निर्देशांक प्रणाली को लोकप्रिय बनाया।

उसकी पद्धति ने भविष्य की आधुनिक मानचित्रण तकनीक की नींव रखी।

हालाँकि भौगोलिक जानकारी सीमित थी।


१५०७: एक नया मोड़

१५०७ में जर्मन मानचित्रकार मार्टिन वॉल्डसीम्यूलर ने एक नया विश्व मानचित्र प्रकाशित किया।

यह पहला मानचित्र था जिसमें “अमेरिका” नाम अंकित किया गया।

उसने अमेरिगो वेस्पुची के अभियानों के आधार पर नए महाद्वीप को अलग पहचाना।

यह विश्व दृष्टिकोण में ऐतिहासिक परिवर्तन था।

टॉलेमी से आधुनिक युग तक

टॉलेमी की निर्देशांक प्रणाली ने भविष्य के मानचित्रण की नींव रखी।

मध्यकाल में उसकी रचनाएँ संरक्षित रहीं।

पुनर्जागरण काल में यूरोप ने उन्हें पुनः अपनाया।

नए समुद्री अभियानों ने विश्व की वास्तविक संरचना स्पष्ट की।

१५२२ में मैगेलन के अभियान ने पृथ्वी की परिक्रमा पूरी कर पृथ्वी की गोलाई की पुष्टि की।

देशांतर समस्या का समाधान

देशांतर की सटीक माप १८वीं शताब्दी में संभव हुई।

१७६१ में जॉन हैरिसन ने सटीक समुद्री क्रोनोमीटर विकसित किया।

इससे समुद्री यात्राएँ अधिक सुरक्षित और सटीक हुईं।

यही आधुनिक मानचित्रण विज्ञान का निर्णायक चरण था।

अंतिम निष्कर्ष

सबसे प्रारंभिक विश्व मानचित्र प्राचीन सभ्यताओं ने बनाए।

लेकिन दूसरी शताब्दी में टॉलेमी ने वैज्ञानिक आधार पर व्यवस्थित विश्व मानचित्र प्रस्तुत किया।

उसका मानचित्र पूर्णतः सटीक नहीं था।

फिर भी उसने गणितीय निर्देशांक प्रणाली के माध्यम से आधुनिक भूगोल की नींव रखी।

१५०७ और उसके बाद के अभियानों ने विश्व को वास्तविक रूप में समझने की दिशा दी।

इस प्रकार विश्व मानचित्र मानव जिज्ञासा, विज्ञान और अन्वेषण की संयुक्त यात्रा का परिणाम है।


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