back to top

संबंधित पोस्ट

विशेष कलाकार

रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

पक्षियों से हार गया देश! ऑस्ट्रेलिया का अनोखा इमू युद्ध

क्या सच में किसी देश ने पक्षियों से युद्ध किया?

साल 1932।

ऑस्ट्रेलिया का पश्चिमी इलाका।

किसानों की फसलें तेज़ी से नष्ट हो रही थीं।

दुश्मन?

कोई सेना नहीं।

हज़ारों इमू पक्षी।

समस्या इतनी गंभीर क्यों हुई?

प्रथम विश्व युद्ध के बाद सरकार ने सैनिकों को खेती के लिए ज़मीन दी।

लेकिन 1932 में सूखा पड़ा।

इमू पक्षियों के बड़े झुंड अंदरूनी इलाकों से खेती वाले क्षेत्रों की ओर बढ़े।

वे गेहूँ की फसल खाते, और बाड़ तोड़ देते।

किसान असहाय थे।


सरकार ने क्या किया?

किसानों ने सरकार से मदद मांगी।

सरकार ने सेना भेज दी।

मशीन गन के साथ।

यहीं से शुरू हुआ — इमू युद्ध।

सेना बनाम पक्षी — क्या हुआ मैदान में?

नवंबर 1932।

ऑस्ट्रेलियाई सेना ने मशीन गन के साथ कार्रवाई शुरू की।

उद्देश्य था — इमू की संख्या कम करना।

लेकिन वास्तविकता कल्पना से अलग थी।

इमू क्यों नहीं रुके?

इमू तेज़ दौड़ते हैं।

वे 50 किमी प्रति घंटे तक भाग सकते हैं।

वे समूह में फैल जाते थे, जिससे गोलीबारी प्रभावी नहीं होती थी।

मशीन गन जाम भी हो गई।

गोली चली, लेकिन निशाना नहीं लगा।


वैज्ञानिक और ऐतिहासिक विश्लेषण

ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार करीब 10,000 इमू थे।

हजारों गोलियाँ चलाई गईं, लेकिन बहुत कम पक्षी मारे गए।

सैन्य रिपोर्टों में स्वीकार किया गया कि अभियान अपेक्षित सफलता नहीं दे पाया।

इतिहासकारों के अनुसार यह एक “लॉजिस्टिक विफलता” थी।

इमू अधिक संगठित लगे, सेना कम प्रभावी।

युद्ध रोक दिया गया

कुछ ही दिनों में कार्रवाई रोकनी पड़ी।

सेना वापस बुला ली गई।

इमू अब भी खेतों में थे।

और दुनिया ने देखा — एक अनोखी हार।

आखिर इस “युद्ध” का परिणाम क्या रहा?

सैन्य अभियान विफल रहा।

इमू की आबादी लगभग बनी रही।

सरकार को रणनीति बदलनी पड़ी।

बाद में बाउंटी सिस्टम लागू किया गया।

शिकार के बदले इनाम दिया जाने लगा।

सरकारी नीति में बदलाव

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार सीधा सैन्य हस्तक्षेप प्रभावी नहीं था।

कृषि संरक्षण के लिए स्थानीय उपाय बेहतर साबित हुए।

विशेषज्ञ मानते हैं कि वन्यजीव नियंत्रण सैन्य समस्या नहीं होता।

यह पारिस्थितिकी और नीति का प्रश्न है।


इतिहास का व्यंग्य

आज “इमू युद्ध” इतिहास की सबसे विचित्र घटनाओं में गिना जाता है।

यह मज़ाक भी है, और चेतावनी भी।

एक आधुनिक राष्ट्र पक्षियों से हार गया।

लेकिन असली कहानी रणनीति की विफलता की है।

हम क्या सीखते हैं?

प्रकृति को बल से नहीं जीता जा सकता।

पारिस्थितिकी संतुलन अत्यंत जटिल है।

इतिहासकारों के अनुसार इमू युद्ध हमें सिखाता है कि समाधान वैज्ञानिक समझ से आता है।

शक्ति से नहीं।

फ्रेश चुटकुले



भारतीय इतिहास – सामान्य ज्ञान – भाग दो

वैदिक सभ्यता सरस्वती नदी के तटीय क्षेत्र जिसमें आधुनिक भारत के पंजाब (भारत) और हरियाणा राज्य आते हैं, में विकसित हुई। आम तौर पर अधिकतर विद्वान वैदिक सभ्यता का काल 2000 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व के बीच में मानते है, परन्तु नए पुरातत्त्व उत्खननों से मिले अवशेषों में वैदिक सभ्यता से संबंधित...

दिमाग आदतें कैसे बनाता है?

आदतें केवल इच्छाशक्ति का मामला नहीं होतीं। यह लेख वैज्ञानिक दृष्टि से समझाता है कि दिमाग आदतें कैसे बनाता है, क्यों दोहराव ज़रूरी होता है और आदतें बदलना इतना कठिन क्यों होता है।


error: Content is protected !!