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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

काँच: दिखने में नाज़ुक, असल में ताकतवर

क्या काँच सच में कमजोर है?

काँच गिरते ही टूट जाता है।

इसीलिए हम उसे नाज़ुक मान लेते हैं।

लेकिन विज्ञान की नजर से देखें, तो कहानी बिल्कुल अलग है।

वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार काँच एक “अमॉर्फस ठोस” है।

यह न पूरी तरह तरल है, न पूरी तरह पारंपरिक ठोस।

इसकी आंतरिक संरचना क्रिस्टल जैसी व्यवस्थित नहीं होती।

इसी अव्यवस्थित संरचना के कारण यह पारदर्शी भी है और आश्चर्यजनक रूप से कठोर भी।

काँच बनता कैसे है?

काँच मुख्यतः सिलिका यानी रेत से बनता है।

जब सिलिका को 1700°C से अधिक तापमान पर पिघलाया जाता है, तो यह तरल बन जाती है।

तेजी से ठंडा करने पर इसके अणु व्यवस्थित क्रिस्टल नहीं बना पाते।

यही उसे पारदर्शी बनाता है।

जलवायु अध्ययनों और पदार्थ विज्ञान शोधों में पाया गया कि इसी संरचना के कारण काँच प्रकाश को गुजरने देता है, लेकिन आसानी से झुकता नहीं।

तो फिर यह टूटता क्यों है?

काँच मजबूत है, लेकिन लचीला नहीं।

जब उस पर अचानक दबाव पड़ता है, तो उसकी संरचना तनाव सह नहीं पाती।

और वह टूट जाता है।

कमजोरी नहीं — लचीलापन की कमी।


जब काँच को और मजबूत बनाया गया

साधारण काँच टूटता है।

लेकिन इंजीनियरिंग ने उसे खतरनाक से सुरक्षित बना दिया।

यहीं से शुरू होती है टेम्पर्ड ग्लास की कहानी।

टेम्पर्ड ग्लास कैसे काम करता है?

स्वास्थ्य और औद्योगिक सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि टेम्पर्ड ग्लास साधारण काँच से कई गुना मजबूत होता है।

इसे पहले अत्यधिक गर्म किया जाता है, फिर अचानक ठंडा किया जाता है।

इस प्रक्रिया से उसकी बाहरी सतह संकुचित हो जाती है और अंदर तनाव बनता है।

यही आंतरिक तनाव उसे मजबूत बनाता है।

जब यह टूटता भी है, तो बड़े नुकीले टुकड़े नहीं बनते।

बल्कि छोटे दानों में बिखरता है — जो कम खतरनाक होते हैं।

बुलेटप्रूफ ग्लास सच में बुलेट रोकता है?

वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार बुलेटप्रूफ ग्लास सिर्फ एक परत का नहीं होता।

यह कई काँच की परतों और प्लास्टिक (पॉलीकार्बोनेट) की परतों से बना होता है।

गोली टकराने पर ऊर्जा कई परतों में फैल जाती है।

यही ऊर्जा वितरण प्रभाव को कम करता है।

यह “अटूट” नहीं है।

यह ऊर्जा को सोखता है।

आज काँच कहाँ-कहाँ उपयोग हो रहा है?

स्मार्टफोन स्क्रीन।

गगनचुंबी इमारतें।

हवाई जहाज़ की खिड़कियाँ।

और यहाँ तक कि अंतरिक्ष यान के हिस्सों में भी।

काँच अब नाज़ुक नहीं, इंजीनियरिंग की शक्ति है।


काँच ने आधुनिक दुनिया को कैसे बदल दिया?

हम हर दिन काँच को छूते हैं।

लेकिन शायद ही कभी उसकी शक्ति को समझते हैं।

स्मार्टफोन, लैपटॉप, कार की विंडशील्ड, ऊँची इमारतें — सब काँच पर टिके हैं।

फाइबर ऑप्टिक्स – काँच में दौड़ती रोशनी

वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि फाइबर ऑप्टिक केबल काँच के बेहद पतले धागों से बनते हैं।

इन्हीं के माध्यम से इंटरनेट डेटा प्रकाश की गति से चलता है।

आपका वीडियो कॉल, ऑनलाइन पेमेंट, स्ट्रीमिंग — सब उसी काँच से गुजरता है।

काँच केवल देखने का माध्यम नहीं, संवाद का आधार बन चुका है।

वैज्ञानिक दृष्टि से काँच क्यों अनोखा है?

भौतिक विज्ञान के अनुसार काँच एक “अमॉर्फस सॉलिड” है।

यानी यह ठोस है, लेकिन इसकी संरचना तरल जैसी अव्यवस्थित होती है।

यही अनोखी संरचना इसे पारदर्शी बनाती है।

और यही कारण है कि यह प्रकाश को नियंत्रित कर सकता है।

निष्कर्ष

काँच दिखने में नाज़ुक है।

लेकिन सभ्यता की रीढ़ है।

इसने हमें दुनिया देखने, संवाद करने और सुरक्षित रहने की शक्ति दी है।

नाज़ुक दिखने वाली चीज़ हमेशा कमजोर नहीं होती।

कभी-कभी वही सबसे मजबूत होती है।


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