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मुफ्त की रेवड़ी और दूसरी लत

मुफ्त की रेवड़ी और दूसरी लत

एक पौवे पर, दूसरा पौवा
मुफ्त बेचने वाले,
मुफ्त की रेवड़ी, बाँट रहे थे,
रेवड़ी के पेड़े, सबसे ज्यादा
बेवड़े पा रहे थे,

पीते पीते, लग गया दाना
बेवड़ा बन गया दीवाना,
नौकरी छिनी, घर बिका,
सेहत गिरी, धन छिना,

बुरी लत है ये, मज़ाक नहीं ये,
अब दूसरा पौवा, हो गया गुम,
लत लगी दूसरे पौवे की,
अब दूसरा पैसा, मुफ्त का,
बेवड़े, कहाँ से लाओगे तुम,

अब अपना ही पैसा खोना है,
लत बुरी, बड़ी चीज़ है,
अब मुफ्त में ही, रोना है…

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता सामाजिक व्यंग्य के माध्यम से मुफ्त की मानसिकता और शराब जैसी बुरी लत पर चोट करती है। शुरुआत में “मुफ्त” आकर्षक लगती है, लेकिन धीरे-धीरे वही आदत जीवन की जड़ें खोखली कर देती है।

कवि दिखाते हैं कि जब व्यक्ति मेहनत छोड़कर आसान रास्ता चुनता है, तो उसका परिणाम नौकरी, घर, सेहत और सम्मान के नुकसान के रूप में सामने आता है। कविता चेतावनी देती है कि लालच और लत दोनों अंततः व्यक्ति को खाली हाथ छोड़ देते हैं।


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